नोटा क्या है, नोटा मतदान चिन्ह का इतिहास (What Is NOTA, full form, election symbol meaning In Hindi)

कुछ साल पहले अगर चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में से कोई भी उम्मीदवार किसी मतदाता को काबिल नहीं लगता था, तो मतदाता अपना वोट देने नहीं जाया करते थे और ऐसे में वो अपने मतदान का इस्तेमाल करने से वंचित रह जाते थे. लेकिन अब हमारे देश के नागरिकों को मतदान करते समय ‘नोटा’ का विकल्प दिया जाने लगा है और इस विकल्प का इस्तेमाल वोटिंग के दौरान कई लोगों द्वारा किया भी जा रहा है. नोटा क्या है (What Is NOTA and Meaning) नोटा शब्द का नाता चुनाव से है और इसका इस्तेमाल कोई भी नागरिक अपना मत डालते हुए कर सकता है. अगर मतदाता को अपना वोट डालते समय ऐसा लगता है कि उसके यहां से खड़े हुए किसी भी पार्टी का उम्मीदवार, जीतने के काबिल नहीं है, तो वो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन या ईवीएम में दिए गए नोटा बटन को दबा कर अपना मत किसी भी उम्मीदवार को ना देने का विकल्प चुन सकता है. वहीं वोटों की गिनती के समय उस मतदाता का डाला गया वोट नोटा में गिना जाता है. नोटा का पूरा नाम (NOTA Full Form) नोटा का फूल फॉम ‘नन ऑफ द अबब’ होती है और इसे हिंदी में “इनमें से कोई भी नहीं” कहा जाता है. वहीं वोटिंग मशीन में ये आपको नोटा का रूप में लिखा हुआ मिलता है और इसका बाकायदा एक निशान भी मशीन पर बना होता है. नोटा का इतिहास (History) नोटा का सबसे पहले इस्तेमाल संयुक्त राज्य अमेरिका में किया गया था और साल 1976 में इस देश के नेवादा राज्य में हुए इलैक्शन में वहां के लोगों को यह विकल्प दिया गया था. जिसके बाद अन्य देशों ने भी धीरे धीरे इस विकल्प को अपने देश के मतदातों को देना शुरू कर दिया था. भारत में इसका इस्तेमाल कब किया गया था (When Was NOTA First Used In India) साल 2009 में नोटा को वोटिंग के दौरान शामिल करने को लेकर भारत के चुनाव आयोग ने एक अर्जी उच्चतम न्यायालय में दी थी और इस अर्जी में भारत के चुनाव आयोग ने नोटा बटन को ईवीएम मशीन में जोड़ने की बात कही थी. हालांकि उस वक्त की केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग का इस फैसले में साथ नहीं दिया था और सरकार इस विकल्प को ईवीएम मशीन में नहीं जोड़ना चाहती थी. वहीं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज जो कि एक गैर-सरकारी संगठन था, उसने चुनाव आयोग के नोटा के विकल्प को वोटिंग के दौरान जोड़ने के फैसले का समर्थन किया था. साल 2013 में नोटा को लेकर उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया था और उच्चतम न्यायालय भी इसके पक्ष में था. जिसके बाद से इस विकल्प को ईवीएम मशीन में जोड़ दिया गया था और लोगों को कोई भी उम्मदीवार काबिल ना लगने पर अपना मत उनको ना देने का अधिकार मिल गया था. उच्चतम न्यायालय से नोटा को मंजूरी मिलने के बाद पांच राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में इसे प्रथम बार इस्तेमाल किया गया था और इन राज्यों में 15 लाख से ज्यादा लोगों ने इस विकल्प का इस्तेमाल भी किया था. इन चुनाव के बाद साल 2014 में हुए लोकसभा के चुनावों में भी ईवीएम मशीन में इस विकल्प को जोड़ा गया था. नोटा का चिह्न (Nota Symbol) ईवीएम पर बने इसके चिह्न में एक मतपत्र है और उस पर एक क्रॉस का निशान बनाया गया है. इस चिह्न को 18 सितंबर 2015 को चुनाव आयोग द्वारा चुना गया था. और इस चिह्न को गुजरात के राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, द्वारा बनाया गया था. किन देशों में नागरिकों को दिया जाता है नोटा का विकल्प (Which other countries allow NOTA?) भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी नोटा का विकल्प वोटरों को वोट डालते समय दिया जाता है और इस वक्त कोलंबिया, यूक्रेन, ब्राजील, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्पेन, स्वीडन, चिली, फ्रांस, बेल्जियम और ग्रीस जैसे देशों में इसका प्रयोग किया जा रहा है. इन देशों के अलावा अमेरिका अपने देश में इसका इस्तेमाल कुछ मामलों में करने की अनुमति देता है. निष्कर्ष- नोटा का विकल्प मिलने से उन लोगों को अपने मत का उपयोग करने का हक मिल गया है जो कि अपना पसंदीता उम्मीदवार ना होने के कारण अपना वोट डालने से वंचित रह जाते थे.

भारत में किसका शासन है लोकतंत्र, पार्टीतंत्र या सुप्रीम कोर्ट

अगर पार्ट किसी कुत्ते, गधे, बिलाव या सपोले को टिकट दे तो आप को उसका चुनाव करना होगा ये सुप्रीम कोर्ट कहता है। प्रजातंत्र है  सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, राज्यसभा चुनाव में नहीं होगा NOTA का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय निर्वाचन आयोग की अधिसूचना पर सवालिया निशान खड़ा करते हुए कहा कि नोटा सीधे चुनाव में सामान्य मतदाताओं के इस्तेमाल के लिए बनाया गया है।

नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने मंगवार को राज्यसभा चुनाव को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ अर्थात् (नोटा) के विकल्प की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि NOTA का विकल्प सिर्फ प्रत्यक्ष चुनावों के लिए दिया गया है न कि राज्यसभा जैसे चुनावों के लिए।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की अधिसूचना भी रद्द चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने शैलेष मनुभाई परमार की याचिका पर राज्यसभा चुनाव के मतपत्रों में नोटा के विकल्प की इजाजत देने वाली भारतीय निर्वाचन आयोग की अधिसूचना भी रद्द कर दी। शैलेष मनुभाई परमार गुजरात कांग्रेस के नेता हैं और ये याचिका उन्होंने 2017 में उस वक्त दायर की थी, अहमद पटेल की उम्मीदवारी पर बीजेपी और कांग्रेस में विवाद हो रहा था।

आयोग की अधिसूचना को दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना पर सवालिया निशान खड़ा करते हुए कहा कि नोटा सीधे चुनाव में सामान्य मतदाताओं के इस्तेमाल के लिए बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने मतपत्रों में नोटा के विकल्प की इजाजत देने वाली आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी थी।

कांग्रेस ने भी किया था नोटा का विरोध

न्यायालय ने गत 30 जुलाई को सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। गुजरात कांग्रेस के नेता का कहना था कि राज्यसभा चुनाव में यदि नोटा के प्रावधान को मंजूरी दी जाती है तो इससे ‘खरीद-फरोख्त और भ्रष्टाचार’ को बढ़ावा मिलेगा। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भी राज्यसभा चुनाव के लिए नोटा का विरोध किया था।

भगवान भरोसे देश के युवा ?

देश का हर नागरिक भ्रष्टाचार से परेशान हैं, चाहे वह सरकारी कार्य हो या प्राइवेट कार्य हर महकमा भ्रष्टाचार में लिप्त हैं , चपरासी से लेकर बड़े से बड़े सरकारी महकमे का कर्मचारी इस गोरखधंधे में व्यस्त हैं, देश के बड़े-बड़े कानून इस भ्रष्टाचार के आगे फेल हैं, क्योकि देश की कानून व्यवस्था भी अब ‘’बलि के बकरे’’ समान हो चुकी हैं ,क्योंकी देश का हर कानून पैसे की चमक के आगे फ़ीका पड़ना स्वभाविक सी बात हो गयी हैं, बात करे देश के नोजवान की जो अपनी पढ़ाई पूरी कर दिन-रात मेहनत करके कम्पीटीशन की तेयारी करता हैं और फिर किसी सरकारी जॉब के लिए मोटी सी फीस के साथ अप्लाई करता हैं और तब उसे दुःख होता हैं जब उस पेपर को तेयारी और पैसा इस बात के लिए बर्बाद होता हैं पेपर करवाने वाली संस्था ने कुछ अभ्यर्थियों से पैसे लेकर उस पेपर को लीक कर दिया और पेपर केंसल हो गया ! आखिर क्या बीतती होगी देश के युवा पर जिसके माँ-बाप की गाढ़ी कमाई खर्च करके बी-टेक और ऍम.बी.ए. जेसी डिग्रियां हासिल की ,उसे चपरासी तक की नोकरी नही मिल रही ! इससे युवाओ में भारी हताशा है और युवा यह कहते हैं की “ पकोड़े बेचकर “ जीवन बिताना नही चाहते ! यही हाल देश की शिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं का हैं जो देश के ग्रामीण अंचलो में सिर्फ कागजो पर चल रही हैं जिसमे अरबो रुपया बर्बाद हो रहा हैं और जनता को कुछ भी लाभ नही हो रहा हैं , और यह बहुत ही गंभीर स्थिति हैं , बेंको से अरबों रुपया निकाल कर विदेश भागने वाले विजय माल्या व् नीरव मोदी जेसे लोगो ने आम भारतीय का बेंक व्यवस्था में जो विस्वास था ,उसे तोड़ दिया हैं इस देश व् हर क्षेत्र में हतासा फेलने का काम किया हैं, देश की न्यायपालिका से किसी भी स्तर पर वास्ता पड़ा हैं वह व्यक्ति बता सकता हैं की किस हद तक भ्रष्टाचार व्याप्त हैं लेकिन न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए आजतक किसी भी सरकार ने ठोस कदम नही उठाया ! देश में ऐसे तमाम मुद्दे है जिस पर वर्तमान की सरकार भी ध्यान देना उचित नही समझती हैं आज जरुरत इसी बात की हैं की देशवासी इन बुनयादी सवालों के हल खोजे और उन्हें लागु करने के लिए माहौल बनाये ! आओ सब मिलकर एक जुट हो जाये , राष्ट्र को भ्रष्ट मुक्त बनाये , “ नोटा “ से नेताओं की नींद जगाये !

जातिवाद की राजनीति ?

लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार सभी को हैं लेकिन इस अधिकार का दुरूपयोग भी नही होना चाहिए, जनतंत्र में जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों और उनसे बनी सरकार से अपेक्षा की जाती हैं की बिना किसी भेदभाव के समग्र रूप से राष्ट्र के विकास का नियोजन करे , और सत्ता प्राप्ति का मुख्य उदेश्य भी राष्ट्र के निर्माण का होना चाहिए, लेकिन वर्तमान में जातिवाद विचारधारा से प्रेरित राजनेता और उससे विकसित राजनितिक पार्टी केवल जातीय आन्दोलन खड़ा कर अपनी राजनितिक प्रष्ठभूमि तेयार करने में संग्लन हैं, पिछले सालो में देखने को आया की जातीय आन्दोलनों की एक श्रंखला चली जातीय आंदोलनों में गुर्जर आन्दोलन , जाट आन्दोलन, पाटीदार आन्दोलन, प्रमुख हैं, और इन आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य जातिवाद आरक्षण का रहा हैं, क्योकि राजनेताओ का सम्बन्ध जातीय संगठनो के गर्भ से होता हैं , इसलिए जाति को संगठित बनाये रखने के लिए समय-समय पर जातीय मुद्दे उठाना भी जरुरी होता हैं, भारत का उच्चतम न्यायलय एक ऐसी जगह हैं जंहा प्रत्येक समस्या का पूरा समाधान किया जाता हैं, लेकिन कई बार शीर्ष न्यायलय से अनुकूल फेसला न आने पर राजनितिक पार्टीया आन्दोलन पर उतारू होने पर भी नही चुकती, और इन आन्दोलन का मुख्य उदेश्य अपना वोट बैंक तेयार करना और विपक्ष को कमजोर दिखाना हैं, इन आन्दोलन से हो रहे देश को आर्थिक नुकशान से इन पार्टीधारियों को कोई फर्क नही पड़ता , आर्थिक नुकशान की भरपाई आम जनता को महगाई के तोर पर करनी पड़ती हैं, वर्तमान में देश की राजनितिक पार्टियों का जातिवाद यहा तक ही सिमित नही रह जाता हैं , चुनाव के समय पार्टी के प्रत्यासी को जातिवाद समीकरण का आधार व् क्षेत्र की समस्या को ध्यान में रख कर टिकट देना आम बात हैं , देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जंहा जातिवाद की प्राथमिकता को ध्यान में रखते हुए उस क्षेत्र को जातिवाद प्रतिबंद क्षेत्र माना जाता हैं, और ऐसे क्षेत्रो में जब चुनाव प्रत्यासी चुनाव जीत कर सत्ता में आता हैं तो वंहा जातिवाद को बढ़ावा देना आम बात है और ऐसी जगह जातिवाद आन्दोलन पैदा होते हैं, कई बार ऐसा लगता हैं की अधिकतर मुद्दे राजनितिक आरक्षण या जातिवाद से सम्बधित हैं या फिर क्षेत्रवाद से सम्बधित हैं, ऐसी राजनितिक पार्टियों ने देश में भ्रष्टाचार और गरीबी को बढ़ावा देने का काम किया हैं! जातिवाद हटाना हैं , निर्वाचन को जगाना हैं, “नोटा” बटन दबाना हैं

कौन सुनेगा किसको सुनाये ?

हमारे देश की जनता का दुर्भाग्य हैं की स्वतंत्र देश का नागरिक होने के बावजूद भी जाति, धर्म, के नाम से हर भारतवासी जकड़ा हुआ हैं, देश की आजादी के समय हर नागरिक का एक ही मकसद था, अंग्रजो से आजादी और इस आजादी में हर भारतवासी एक था, लेकिन आजादी के बाद कुछ लोगों ने अपनी सियासती ताकत आजमाना शुरू कर दिया ! और देश को जाति, धर्म से तोड़ने का काम किया, जिसके परिणाम स्वरूप आज भारत कई टुकडो में बंटा हुआ हैं, और यह दौर निरंतर जारी है, जिसके कारण देश को अन्दर से कमजोर करने के साथ देश की अर्थव्यवस्था का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा हैं , और विदेशी ताकते देश पर पूरी तरह से हावी हो रही हैं, जिससे देश का नागरिक बेरोजगारी, भूखमरी की कगार पर हैं, देश की आजादी के 71 साल बाद भी देश के हालात जेसे के तेसे हैं , 71 साल बाद भी देश की कानून व्यवस्था का कोई फर्क देखने को नही मिलता हैं , भारत कृषि प्रधान देश होने के बाद भी देश का किसान आत्महत्या कर रहा हैं और हर साल यह आकड़ा बढ़ता जा रहा हैं, आखिर सवाल इस बात को सोचने पर मजबूर करता हैं की देश का किसान खेत में दम तोड़ता हैं और देश का जवान देश की रक्षा के लिए दम तोड़ता हैं , लेकिन सरकारों ने इन दोनों के लिए आज तक क्या किया ? यह केसी व्यवस्था हैं मेरे देश की ! आखिर क्यों नही बनता इनके लिए भी कोई कानून ! लेकिन देश की पार्टियों का इन पर सियासत करने का मोका बिलकुल नही चुकती और देश की जनता को बेवकूफ बनाने का काम हर बार करती रहती हैं , और बेरोजगारों को धर्म व् जाति के नाम से दंगे करवाने का काम करते हैं जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था में काफी नुकसान होता हैं , और लोकतंत्र की पार्टिया एक-दुसरे को नीचा दिखाने में कामयाब हो जाती हैं, उन पार्टियों के नेताओ का काम सिर्फ घोटालों की बाढ़ का काम करने के समान होता हैं, जिससे देश की सरकार का ध्यान देश की जनता पर नही जाता और देश का नागरिक अपने भाग्य को कोसता हैं और देश की अर्थव्यवस्था भगवान भरोसे पर चलती हैं ! आओ चुने एक अच्छा विकल्प, सब मिलकर करे संकल्प आखिर ऐसा क्यों हर बार होता हैं , अब तो चुनाव निशान “नोटा” हैं,,

एक नजर आंदोलन Vote for #NOTA

एक नजर आंदोलन Vote for #NOTA नेता आम जनता से आंदोलन करवाते है, और आम जनता का ही नुकसान करवाते है, आम जनता के ही रास्ते रुकते है, इन नेताओ का क्या जाता है, इन्हे सबकुछ मिलता है धाराएं तो आम जनता पर लगती है, भूख और बीमारी से आम जनता और मासूम बच्चे मरते है। नेताओ का क्या जाता है, ये तो फोर्स के साथ निकलते है, अब हम मिलकर नेताओ के रास्ते रोकते है आओ अब हम सब मिलकर देश के लिए आंदोलन करते है देखते है कौन- कौन सा नेता अपने साथ आता है, नोटा में वोट दे के किसी भी नेता का चुनाव नहीं करेंगे जब तक पार्टी तंत्र से पूर्ण लोक तंत्र नहीं होता जब तक देश में एक व्यक्ति एक कानून और देश के रिक्त सारे पद सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति नहीं भरते।