आजाद देश के गुलाम लोग

हमारे देश को आजाद हुए 71 साल हो गये लेकिन देश का हर एक नागरिक आज भी गुलाम हैं, अपने हक़ के लिए दर-दर की ठोकरे खाते हैं, बात करे अपने मूलाधिकारो की तो मानव अधिकार का सवाल पहले आता हैं, भारत में व्यक्ति को अपने मूल अधिकार से आज भी वंचित हैं, जँहा नई पीढ़ी आजाद भारत का वारिस होने पर दम भरती हैं, और भ्रस्टाचार और अपराध को मिटाना चाहती हैं तो वहा उसे जातिवाद आरक्षण से जकड़ लिया जाता हैं, आज देश का छोटे से छोटा नागरिक भ्रस्टाचार का शिकार हैं, हमारे देश का हर एक कानून गरीब के लिए बना हैं, बड़े दिग्गजों ने अपनी काली कमाई से सरकार के हर महकमे को खरीद रखा हैं, और गरीबो की कही पर सुनवाई नही होती उन पर अत्याचार होता हैं, अगर कोई व्यक्ति देश का जागरूक नागरिक होने के नाते (RTI सुचना का अधिकार ) के तहत कोई जानकारी मांगता हैं, और अव्यवस्था और भ्रस्टाचार की पोल खुलने पर उस व्यक्ति को उसकी जान का खतरा रहता हैं, और देश को आजाद हुए 71 साल तो हो गये लेकिन हमारी बहन-बेटी आज भी सुरक्षित और आजाद नही, यही हमारा और हमारे देश का दुर्भाग्य है की हम अभी 21 वी सदी में भी अन्य देशों से इतने पीछे हैं, हमारा देश अंग्रेजो से तो आजाद हो गया लेकिन व्यक्तिगत रूप से देश का हर नागरिक आज भी गुलामी में जीवन यापन कर रहा है !                            और ना सहेंगे हम, देश को जगाना हैं                 अपने हक के लिए सत्ता के ठेकेदारों को “ नोटा “ से सबक सिखाना हैं

नेताओं की भी तय हो शेक्षिक योग्यता ?

हमारी सरकारे हर नागरिक को मतदान के प्रति जागरूक करने का जो कार्य कर रही हैं वह बहुत ही अच्छा काम है इसके साथ हमें यह जानना भी जरुरी हैं की इसके प्रति मतदाताओ को अपने मूल अधिकारो का भी ज्ञान होना जरुरी हैं , आज के भारत वर्ष में इस लोकतंत्र के कानून सिर्फ आम जनता के लिए ही बनाये जाते हैं, बात करे मताधिकार के पार्टी का प्रत्यासी एक समय में दो जगह चुनाव लड़ सकता हैं, और मतदाता को अपने मूल स्थान पर ही वोट देने का अधिकार हैं, बात करे शेक्षिक योग्यता की तो आम व्यक्ति को चतुर्थ श्रेणी पद के लिए उच्च शिक्षा की डिग्रियों की आवश्कताओ के साथ तमाम कम्पीटीशन के बाद उसे मुकाम हासिल होता हैं, लेकिन लोकतंत्र में जो नेता हमारे बीच आते है उन्हें चुनाव लड़ने के लिए किसी भी उच्च स्तर की शिक्षा की आवश्कता की जरूरत नही होती ऐसी व्यवस्था हमारे लोकतंत्र कानून में है, और जब हमारे द्वारा चुने गये अनपढ नेता प्रत्यासी जब न्याय के मंदिर विधानसभा में जाते हैं, तब वो हमारे लिए क्या कानून व्यवस्था लागु करेगे जिन्हें खुद को कानून का पूरा ज्ञान नही होता वो जनता का क्या भला चाहेंगे, सवाल इस बात का है की देश की कानून व्यवस्था तभी सही ढंग से चल सकती हैं जब देश के हर नागरिक को शिक्षित हो, चाहे वो देश की सत्ता संभालने से लेकर मजदुर वर्ग का व्यक्ति भी क्यों ना हो, क्योकि अक्सर गाँवो में हम देखते हैं की मतदान के समय जो नेता हमारे बीच आते हैं वो चुनाव जीत जाने के बात हमें नजर भी नहीं आते, और विकास कार्यो की डोर हमारे बीच मजाक बन कर रह जाती हैं, और फिर हम अपने भाग्य को कोसते रहते हैं,