नोटा प्रचार के लिए निर्वाचन कार्यालय से अनुमति मांगी

समानता आंदोलन संघर्ष समिति ने जिला निर्वाचन आयोग से नोटा के प्रचार के लिए अनुमति मांगी है। संयोजक यशवंत अग्निहोत्री संभागीय संयोजक देवाशीष शास्त्री ने बताया केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा नोटा का प्रावधान किया है। हमारी समिति लंबे समय से ऐसे प्रत्याशी का इंतजार कर रही है, जो आर्थिक आधार पर आरक्षण का पक्ष समझे लेकिन किसी भी प्रत्याशी का रूख ठीक नहीं है। इसलिए हमने चुनाव में किसी प्रत्याशी का नहीं बल्कि नोटा का प्रचार करने की अनुमति मांगी है।

साजा में नोटा व निर्दलीय प्रत्याशी की अहम भूमिका

साजा के बीते 2013 विधानसभा चुनाव में नोटा (नन ऑफ द एबव) को 4 हजार 50 वोट मिले थे। नोटा 2013 के चुनाव में तीसरे पोजिशन में रहा। वहीं 2013 चुनाव में 3 निर्दलीय प्रत्याशियों को 3625 वोट मिले थे। इसी प्रकार 2008 के चुनाव में 2 निर्दलीय प्रत्याशी को 4372 वोट मिले थे। आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो यहां के विधानसभा चुनाव में नोटा व निर्दलीय प्रत्याशी को मिले वोट की भूमिका अहम रहती है। इस बार के चुनाव में इस क्षेत्र से 8 निर्दलीय प्रत्याशी हैं।

मतदान का प्रचार बढ़ाने के लिए समानता आंदोलन संघर्ष समिति ने नोटा के प्रचार प्रसार के लिए निर्वाचन आयोग से

मतदान का प्रचार बढ़ाने के लिए समानता आंदोलन संघर्ष समिति ने नोटा के प्रचार प्रसार के लिए निर्वाचन आयोग से मांग की है। संयोजक एडवोकेट यशवंत अग्निहोत्री ने बताया आयोग से मांग की है कि नोटा के प्रचार-प्रसार के लिए समाचार पत्रों व अन्य माध्यमों से लोगों तक नोटा का उद्देश्य पहुंचाया जाए। अब भी प्रत्याशियों के प्रति असंतुष्ट होने से लोग वोटिंग करने नहीं जाते है। ऐसे लोगों के लिए नोटा का प्रचार जरूरी है ताकि सौ फीसदी मतदान हो सके

अदालत ने पूछा, नोटा के प्रचार के लिए चुनाव आयोग ने क्या किया

इंदौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की युगल पीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर पूछा है कि आयोग ने निर्वाचन के मद्देनजर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में मौजूद नोटा (इनमें से कोई नहीं) के विकल्प के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए क्या कदम उठाए हैं। प्रशासनिक न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह ने सोमवार को इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका की आगामी सुनवाई विधानसभा चुनाव के बाद 30 नवंबर को तय की गई है। इंदौर निवासी याचिकाकर्ता यशवंत अग्निहोत्री ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से याचिका दायर करते हुए सवाल उठाया कि निर्वाचन आयोग मध्यप्रदेश विधानसभा निर्वाचन के मद्देनजर मतदान प्रतिशत बढ़ाने के उद्देश्य से तो व्यापक प्रचार कर रहा है, लेकिन नोटा जैसे महत्वपूर्ण विकल्प के प्रचार-प्रसार में उदासीन नजर आता है। याची के तर्कों के अनुसार नोटा के व्यापक प्रचार-प्रसार से बेहतर उम्मीदवार नहीं होने की स्थिति में मतदाता मतदान के दौरान नोटा विकल्प का उपयोग कर अपना मत दर्ज करा सकेगा।

देश में पहली बार नोटा होगा काल्पनिक उम्मीदवार, जीता तो दोबारा होगा चुनाव

प्रदेश के पांच नगर निगमों और दो नगर पालिकाओं के चुनाव में राज्य चुनाव आयोग एक बड़ा प्रयोग करने जा रहा है। इस बार मेयर और पार्षद पद के उम्मीदवार के साथ एक ऐसा प्रत्याशी भी चुनाव लड़ेगा, जो किसी को दिखाई नहीं देगा, लेकिन बाकी उम्मीदवारों की हार जीत में उसकी अहम भूमिका होगी। इस छिपे प्रत्याशी का नाम नोटा है। नोटा का मतलब यह है कि चुनाव में जितने भी उम्मीदवार खड़े हैं, उनमें से कोई भी जनता को पसंद नहीं है। ऐसा होने पर इलेक्ट्रिानिक वोटिंग मशीन में मतदाता को नोटा का बटन दबाना होगा। सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों के बाद हरियाणा सरकार ने हालांकि नगर निगम और पंचायत के चुनाव में 2016 में नोटा को लागू कर दिया था, लेकिन पांच नगर निगमों और दो नगर पालिकाओं के चुनाव में अलग ही व्यवस्था की गई है। राज्य चुनाव आयुक्त डॉ. दलीप सिंह के अनुसार दो इलेक्ट्रिानिक वोटिंग मशीन होंगी। एक मशीन पर मेयर के प्रत्याशी को वोट दी जा सकेगी और दूसरे पर पार्षद पद के उम्मीदवार को वोट डलेगी। इन मशीनों में नोटा का बटन भी होगा। यदि नोटा को मिलने वाला वोट किसी भी प्रत्याशी से अधिक होगा तो संबंधित वार्ड अथवा शहर के पूरे इलेक्शन को रद कर दिया जाएगा और नए सिरे से वोटिंग होगी। दूसरी बार होने वाले चुनाव में पहले लड़ चुके उम्मीदवार इलेक्शन लडऩे के लिए अपात्र घोषित हो जाएंगे। डॉ. दलीप सिंह के अनुसार राज्य चुनाव आयोग ने अपने 2016 के ही आदेश को संशोधित कर नए सिरे से लागू किया है। मेयर पद के उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की सीमा 20 लाख रुपये, पार्षद के लिए पांच लाख और नगरपालिका के लिए सदस्य के लिए दो लाख रुपये रखी गई है। चुनाव जीतने और हारने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को 30 दिन के भीतर अपना खर्च का ब्योरा उपलब्ध कराना होगा। ऐसा नहीं करने वाले को भविष्य में चुनाव लड़ने के लिए अपात्र घोषित कर दिया जाएगा। हरियाणा के पांच नगर निगमों यमुनानगर, पानीपत, रोहतक, करनाल और हिसार के 531 लोग इस बार चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। यह वे लोग हैं, जिन्होंने पिछली बार इन निगमों के चुनाव लड़े थे, मगर अलग-अलग कारणों की वजह से अपने खर्च का ब्योरा नहीं दिया था। राज्य चुनाव आयोग ने व्यक्तिगत सुनवाई के बाद भी इन सभी व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी है। हिसार में 113, करनाल में 128, पानीपत में 95, रोहतक में 100 और यमुनानगर में 95 व्यक्ति इस बार नगर निगम के मेयर व पार्षदों का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

NOTA के समर्थन में उतरे कैब ड्राइवर, उम्मीदवारों के छूट रहे पसीने

सभी उम्मीदवारों का प्रचार जोरों पर हैं। उम्मीदवार वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अनेक प्रकार के हथकंडे भी अपना रहे हैं। वहीं नगर के कैब चालक मात्र अनेखा प्रचार करने में जुट गये हैं। कैब चालक ‘नोटा’ का प्रचार कर रहे हैं। कैब चालक कह रहे है कि किसी भी पार्टी को वोट दे तो कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। साथ ही वे ‘नोटा’ को वोट देने का वोटरों से आग्रह कर रहे हैं। हैदराबाद शहर में हजारों कैब चालक अपने वाहनों पर ‘नोटा को वोट’ का पोस्टर लगाकर घूम रहे हैं। इसका प्लकार्ड भी प्रदर्शित कर रहे हैं। कैब चालकों के नोटा प्रचार को देखकर अनेक उम्मीदवारों के पसीने छूट रहे हैं। इस प्रकार प्रचार कर रहे है कैब चालकों ने कहा है कि उनकी समस्याओं पर किसी भी नेताओं ने अब तक ध्यान नहीं दिया है। किसी भी पार्टी की घोषणापत्र में उनकी समस्याओं का उल्लेख नहीं है। तेलंगाना फोर वीलर ड्राइवर असोसिएशन अध्यक्ष शेख सलाउद्दीन ने कहा कि ओला और उबेर जैसे कैब संस्थाओं के कार्यकलाप से उन्हें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ओला और उबेर जैसे संस्थाओं से छुटकारा दिलाने का आग्रह करते हुए सभी राजनीतिक पार्टी के नेताओं से आग्रह किया गया है। साथ ही इस अन्याय के खिलाफ अनेक बार आंदोलन भी किया है। मगर किसी भी पार्टी के नेताओं ने उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी समस्याओं पर सहयोग न देने वाले पार्टी के नेताओं पर से विश्वास उठ गया है। इसीलिए मजबूर होकर नोटा को वोट प्रचार है। आपको बता दें कि तेलंगाना फोर वीलर ड्राइवर असोसिएशन कुछ समय से चालकों के लिए कल्याण बोर्ड गठन करने की मांग कर रहे हैं।

राइट टू रिजेक्ट से दागियों पर लगेगा अंकुश

जागरण कार्यालय, बिजनौर: समाजसेवी अन्ना हजारे ने ‘राइट टू रिजेक्ट’ को लेकर लम्बी लड़ाई शुरू की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में ‘राइट टू रिजेक्ट’ शामिल करने का फैसला सुनाया है। इसका खासोआम ने स्वागत किया है। यानि यदि मतदाता चुनाव में खडे़ किसी भी उम्मीदवार को पसंद नहीं करता है तो वह सभी के खिलाफ मत दे सकता है। नगर के गणमान्य नागरिकों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सराहना की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मतदाता ताकतवर होगा। राजकीय इंटर कालेज के अध्यापक एवं समाजसेवी संस्था नगर कल्याण समिति के अध्यक्ष अशोक निर्दोष का कहना है कि पहले मतदाता के लिए राजनैतिक नेतृत्व आदर्श होता था, जिस पर मतदाताओं को विश्वास रहता था, लेकिन जब से दागी उम्मीदवार चुनाव लड़ने लगे, तब से मतदाता को पार्टी पर विश्वास नहीं रहा। अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी जैसे लोग लम्बे समय से राइट टू रिजेक्ट की मांग कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सभी दल अच्छे उम्मीदवारों को चुनाव में उतारेंगे। संविधान अथवा चुनाव आयोग के पास चुनाव रद्द करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए अधिक लोग यदि उम्मीदवारों को नापसंद करेंगे तो कम लोगों की पसंद का उम्मीदवार ही जीतेगा। उप्र माध्यमिक वित्त विहीन शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष सुरेंद्र प्रकाश का कहना है कि राइट टू रिजेक्ट से मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा। सभी पार्टियां दागी उम्मीदवारों से परहेज करेंगी। साथ ही राजनैतिक दलों को पता चलेगा कि मतदाता उनके तथा उनके प्रत्याशियों के संबंध में क्या विचार रखते हैं। व्यापारी नेता विकास अग्रवाल का कहना है कि राइट टू रिजेक्ट के बाद इवीएम में ‘इनमें से कोई नहीं’ का भी बटन लगेगा। इससे सभी पार्टियों को दागी उम्मीदवारों से परहेज करना पडे़गा। दागी उम्मीदवार ही नहीं, पार्टी को भी अपनी स्थिति का पता चलेगा। उन्होंने कहा कि अनिवार्य मतदान को भी कानून बनना चाहिए। व्यापारी चौधरी रामौतार सिंह का कहना है कि इवीएम में उम्मीदवारों को नापसंद करने के अधिकार शामिल होने से मतदाता और ताकतवर होगा। इस अधिकार के मिलने से वोटिंग प्रतिशत बढे़गा। उम्मीदवारों को पता चलेगा कि मतदाता उसके संबंध में क्या विचार रखते हैं। पार्टी अच्छे उम्मीदवारों को ही प्रत्याशी बनाएगी।

राइट टू रिजेक्ट

राइट टू रिजेक्ट अर्थात नकारात्मक मतदान का मतलब है अगर कोई व्यक्ति वोट देते समय मौजूदा उम्‍मीदवारों में से किसी को नहीं चुनना चाहता है तो वह ‘नन ऑफ दीज’ बटन का प्रयोग कर सकता है। इस अधिकार का अर्थ मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में वह सुविधा और अधिकार देना जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है।[1] आंदोलन 2009 में अण्णा हज़ारे की टीम ने दिल्ली में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन करते समय सरकार से राइट टू रिजेक्‍ट और राइट टू रिकॉल जैसे विषय पर संसद में प्रस्‍ताव पारित कर इन्हें लागू करने की मांग की थी, जिसका सरकार को छोड़ सभी दलों ने समर्थन किया था। 2009 में ही भारतीय चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव में राइट टू रिजेक्‍ट विकल्प को लागू करने की मांग की थी, जिसका सरकार ने काफ़ी विरोध किया था। भारतीय संविधान भारतीय चुनाव अधिनियम 1961 की धारा 49-ओ के तहत संविधान में बताया गया है कि यदि कोई व्‍यक्ति वोट देते समय मौजूद उम्‍मीदवारों में से किसी को भी नहीं चुनना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है। यह उसका वोट देने या ना देने का अधिकार है। हालांकि यह धारा किसी प्रत्याशी को रिजेक्ट करने की अनु‍मति नहीं देती है। उल्लेखनीय है कि नकारात्मक मतदान की अवधारणा 13 देशों में प्रचलित है और भारत में भी सांसदों को संसद भवन में मतदान के दौरान ‘अलग रहने’ के लिए बटन दबाने का विकल्प मिलता है। अत: चुनावों में प्रत्याशियों को खारिज करने का अधिकार संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को दिए गए बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। राइट टू रिकॉल भारत में राइट टू रिकॉल (चुने हुए जन-प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) की बात सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 4 नवंबर 1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान कही थी। ऐसा माना जाता है कि पुरातन समय में यूनान में एंथेनियन लोकतंत्र में राइट टू रिकॉल कानून लागू था। स्विट्‍जरलैंड, अमेरिका, वेनेजुएला और कनाडा में भी राइट टू रिकॉल कानून लागू है। अमेरिका में इस कानून की बदौलत ही कुछ गर्वनरों और मेयरों को हटाया जा चुका है। सबसे पहले स्विट्‍जरलैंड ने इसे अपनाया। स्विट्‍जरलैंड की संघीय व्यवस्था में छह प्रांतों ने इस कानून को मान्यता दे रखी है। 1903 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स, 1908 में मिशिगन और ओरेगान में पहली बार राइट टू रिकॉल प्रांत के अधिकारियों के लिए लागू किया गया। हालांकि अमेरिका में 1631 में ही मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी की अदालत में इस कानून को मान्यता मिल गई थी, लेकिन इसे पहली बार मिशिगन और ओरेगान में लागू किया गया। कनाडा ने 1995 में इस कानून को लागू किया।[1]

नोटा से सहमे राजनीतिक दल

चुनाव से संबंधित एक अच्छा समाचार सुनने को मिला है। महाराष्ट्र चुनाव आयोग आदेश दिया है कि सभी निकाय चुनाव में यदि नोटा को सबसे अधिक मत मिलते हैं, तो चुनाव स्थगित करके दोबारा चुनाव कराया जाएगा। राज्य चुनाव आयुक्त जेएस सहरिया ने कहा कि वे नोटा की सहायता से चुनाव प्रक्रिया को बेहतर करने की उम्मीद कर रहे हैं और ऐसा मतदाताओं की बढ़ी हुई भागीदारी से होगा। नोटा राजनीतिक दलों को योग्य प्रत्याशियों को उतारने के लिए मजबूर करेगा। हमने निश्चय किया कि इसे बदला जाए और नोटा को अधिक प्रभावी बनाया जाए। चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि संशोधित नोटा नियम अगले वर्ष के लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी प्रभावी हो सकते हैं, बशर्ते भारतीय चुनाव आयोग इस प्रकार का संशोधन करे। अभी तक की स्थिति के अनुसार नोटा नियम स्थानीय निकाय चुनावों के लिए लागू हैं, क्योंकि हमने धारा-243 के अंतर्गत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए परिवर्तन कर दिए हैं। चुनाव आयोग धारा-324 के अंतर्गत ऐसे परिवर्तन कर सकता है। वैसे ये अपने आप में ऐतिहासिक निर्णय है। निकाय चुनाव में मतदाता कम होते हैं और वे प्रत्याशियों के गुण-दोषों को भी भली-भांति जानते हैं। ऐसे में नोटा के मत अधिक होने पर चुनाव स्थगित करके दोबारा चुनाव कराया जाएगा। ऐसी परिस्थिति में राजनीतिक दलों का प्रयास रहेगा कि वे योग्य प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारें। देश में पिछले कई वर्षों से नोटा लागू है, परंतु लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नोटा को अधिक मत मिलने पर चुनाव रद्द करने संबंधी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। पिछले बहुत समय से यह मांग उठती रही है कि नोटा को अधिक मत मिलने पर चुनाव को स्थगित करके दोबारा चुनाव कराए जाएं। नोटा का अर्थ है नन ऑफ द एबव अर्थात इनमें से कोई नहीं। जो मतदाता प्रत्याशी के भ्रष्ट, अपराधी होने या ऐसे ही किसी अन्य कारण से उन्हें मत न देना चाहें तो वे नोटा का बटन दबा सकते हैं। इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में यह बटन गुलाबी रंग का होता है, जो स्पष्ट दिखाई देता है। उल्लेखनीय है कि देश में वर्ष 2015 में नोटा लागू हुआ था। वर्ष 2009 में चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर कहा था कि वह इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प उपलब्ध कराना चाहता है, ताकि जो मतदाता किसी भी प्रत्याशी को मत न देना चाहें, वे इसे दबा सकें। इसके पश्चात नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने भी सर्वोच्च न्यायालय में नोटा के समर्थन में एक जनहित याचिका दायर कर नोटा को लागू करने की मांग की। इस पर वर्ष 2013 में न्यायालय ने मतदाताओं को नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने का निर्णय किया. तत्पश्चात निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। साथ ही चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि नोटा के मतों की गणना की जाएगी, परंतु इन्हें रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि नोटा से चुनाव परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वर्ष 2013 में देश में पहली बार चुनाव में नोटा का प्रयोग किया गया। उल्लेखनीय है कि विश्व के अनेक देशों में चुनावों में नोटा का प्रयोग किया जाता है। इनमें बांग्लादेश, यूनान, यूक्रेन, स्पेन, स्वीडन, चिली, फ्रांस, बेल्जियम, कोलंबिया, ब्राजील, फिनलैंड आदि देश सम्मिलित हैं। वास्तव में नोटा मतदाताओं को प्रत्याशियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया देने का विकल्प उपलब्ध कराता है। नोटा के मतों की भी गणना की जाती है। नोटा से पता चलता है कि कितने मतदाता किसी भी प्रत्याशी से प्रसन्न नहीं हैं. वे चुनाव में खड़े किसी भी प्रत्याशी को इस योग्य नहीं समझते कि वे उसे अपना प्रतिनिधि चुन सकें। नोटा के विकल्प से पूर्व मतदाता को लगता था कि कोई भी प्रत्याशी योग्य नहीं है, तो वह मतदान का बहिष्कार कर देता था और मत डालने नहीं जाता था। इसी स्थिति में वह मतदान के अपने मौलिक अधिकार से स्वयं को वंचित कर लेता था। इसके कारण उसका मत भी निरर्थक हो जाता था। परंतु नोटा ने मतदाताओं को प्रत्याशियों के प्रति अपना मत प्रकट करने का अवसर दिया है। देश में नोटा के प्रति लोगों में अधिक जागरूकता नहीं है। आज भी अधिकतर मतदाता नोटा के विषय में नहीं जानते। नोटा लागू होने के पश्चात देश में लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के कई चुनाव हो चुके हैं, परंतु नोटा के अंतर्गत किए गए मतदान की दर मात्र 2 से 3 प्रतिशत ही रही है। विशेष बात ये है कि इनमें अधिकांश वो क्षेत्र हैं, जो नक्सलवाद से प्रभावित हैं या फिर आरक्षित हैं। पांच राज्यों में चुनावी माहौल है। सभी दल अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। वर्ष 2019 लोकसभा के ठीक पहले ये विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा, इसलिए नोटा से राजनीतिक दल घबराये हुए हैं। भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है कि आमजन अपने मतदान का प्रयोग कर अपनी भूमिका से लोकतंत्र की रक्षा करते हैं।

राजस्थान में NOTA अभियान ने BJP और कांग्रेस की टेंशन बढ़ाई

राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस को NOTA ने बुरी तरह डरा दिया है. दोनों पार्टियों की इतनी मेहनत के बावजूद बहुत से इलाकों में NOTA अभियान को गजब का समर्थन मिल रहा है. जैसलमेर, जोधपुर, जयपुर, उदयपुर जैसे शहरों में लोग यही कह रहे हैं कि हम वोट डालने तो जाएंगे पर नोटा दबाकर चलें आएंगे. ये भी पढ़ें- राजस्थान: सट्टा बाजार में BJP को चांस नहीं, कांग्रेस काफी आगे नोटा (NOTA) मतलब है इनमें से कोई नहीं (None Of The Above). वोटिंग मशीन में नोटा बटन दबाना यानी इनमें से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं. बीजेपी और कांग्रेस को ये हालात असहज करने वाले हैं. वोट फॉर नोटा अभियान जाति और धर्म की राजनीति के खिलाफ विरोध के लिए वोट फॉर नोटा अभियान जयपुर में कुछ दिन पहले शुरू हुआ पर अब वो राज्य के जैसलमेर और दूर दराज के शहरों तक पहुंच चुका है. खासतौर पर सवर्ण मतदाता इस अभियान को खूब हवा दे रहे हैं. इसे वॉट्स ऐप में शेयर करने के साथ पर्चियों और पोस्टरों के जरिए भी बंटवाया जा रहा है. नोटा अभियान की शुरुआत एससी-एसटी कानून के खिलाफत में शुरू हुई लेकिन धीरे धीरे इसका दायरा बढ़ता जा रहा है. संगठनों की अपील नोटा विरोध का सही तरीका नहीं कई संगठनों ने लोगों से अपील की है कि वो नोटा के बजाए सबसे अच्छे उम्मीदवार को वोट करें. इस अभियान में जुटे एक संगठन एटर्नल मेमोइर्स एंड कीर्तिवन फाउंडेशन के चेयरमैन एस के तिजारावाला के मुताबिक वो लोगों से अपील कर रहे हैं कि वो चाहे जिसको वोट दें पर वोट जरूर करें. तिजारावाला ने बाकायदा ट्विटर और दूसरे अभियानों के जरिए लोगों से वोट करने की अपील की है. इनमें लोगों को जागरूक किया गया जा रहा है कि नोटा का बटन नहीं बल्कि किसी उम्मीदवार के नाम का बटन दबाएं. तिजारावाला पतंजलि से भी जुड़े हैं. नोटा से कांग्रेस और बीजेपी क्यों परेशान ये अभियान बीजेपी और कांग्रेस दोनों के वोट बैंक में सेंध लगा रहा है. इसलिए दोनों पार्टियां लोगों को मनाने की कोशिश भी कर रही हैं कि नोटा दबाना सही तरीका नहीं बीजेपी और कांग्रेस के डरने की वजह यही है कि 2013 में पहली बार एंट्री के बाद ही नोटा ने शानदार एंट्री मारी है. 2013 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान के 3.02 करोड़ वोट डाले गए थे जिसमें नोटा को करीब 2 परसेंट (लगभग 6 लाख) वोट मिले थे. हालत ये हुई थी कि मैदान में उतरीं 58 पार्टियों में से सिर्फ 4 पार्टियों को ही नोटा से ज्यादा वोट मिले थे. 2013 के वोट पाने वालों में नोटा चौथे नंबर पर बीजेपी- 46 परसेंट कांग्रेस- 33.7 परसेंट नेशनल पीपुल्स पार्टी- 4.3 परसेंट बीएसपी- 3.4 परसेंट नोटा- 1.93 परसेंट सीपीआई, समाजवादी पार्टी, जेडीयू, जेडीएस और एनसीपी जैसी पार्टियों को भी नोटा के मुकाबले कम वोट मिले थे. अशोक गहलोत और सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के नेताओं के साथ अशोक गहलोत और सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के नेताओं के साथ नोटा प्रोमोशन दफ्तर खुले राजस्थान में सवर्णों से जुड़े क्षत्रिय समाज, सर्व समाज संघर्ष समिति जैसे संगठन इस अभियान को हवा दे रहे हैं. समिति का दावा है कि उन्हें कोई सही उम्मीदवार नहीं दिख रहा है इसलिए नोटा पर वोट डालने की अपील कर रहे हैं. जयपुर में तो सर्व समाज संघर्ष समिति ने नोटा प्रोमोशन दफ्तर भी खोल लिया है. दावा किया जा रहा है कि सभी 200 विधानसभा सीटों में उनके कार्यकर्ता नोटा के प्रचार में सक्रिय हैं.