वादे हैं वादों का क्या ?

भारत देश आजाद हुए 71 साल हो गये , कितनी सरकारे आई कितनी गयी लेकिन देश की गरीबी आज तक दूर नही हुई, देश की अर्थ व्यवस्था हर दिन कमजोर होती जा रही हैं, गरीब और गरीब होता जा रहा हैं, अमीर और ज्यादा अमीर होता जा रहा हैं, आखिर क्या होगा मेरे देश का ? अब तो भारत माता भी सोच कर हैरान हैं, क्योंकी सत्ता के पुजारी बेईमान हैं, हमारे देश में हर पांच साल बाद देश की गरीब जनता नई सोच नये जोश के साथ माँ भारती का पुजारी चुनते हैं, तमाम भरोसों के साथ की अब मेरा देश उन्नति करेगा, देश गरीबी मुक्त होगा, और वापिस सोने की चिड़िया कहलायेगा ! लेकिन इन पांच सालो में सिर्फ देश के ठेकेदारों की गरीबी दूर भी नही हो पाती जिनके खाते ‘’स्विस बैंक’’ में हैं ! इतने सालो बाद भी देश के नेताओ ने देश को लुटने का काम किया हैं, चुनाव दर चुनाव जनता को झूटे वादों की खुराक दे कर व् झूटी योजनाओ का पिटारा दिखा कर अपनी सत्ता हासिल करने में कामयाब रहे हैं, देश के आजाद होने के 71 वर्ष बाद भी नेताओ के वादे व् नामर्द इश्तिहार में समानता देखने को मिलती हैं, जो आज तक पूरी नही हुई, इसके बावजूद भी देश की हकीकत यह है की ना तो बीमार व् कमजोर लोग खत्म हुए है और ना ही राजनीती परेशानियों व् समस्याओ का हल ढूढने वालो का टोटा पड़ा हैं, देश के चुनावों को देख के ऐसे लगता हैं की चुनावों का महत्व अब लोगो के लिए मनोरंजन और वक्त काटने का जरिया रह गया हैं, हर चुनाव में नेताओ द्वारा वही घिसे पिटे वादे किये जाते हैं सड़क बनायेगे, लाईट 24 घंटे , पानी , गरीबी दूर करेगे, सबको रोजगार, भ्रस्टाचार मुक्त भारत अबकी बार, आदि-आदि ? और इकठी भीड़ में अपनी वाहवाही करवा कर चले जाते हैं , दरअसल में वादे इतने आत्म्-विश्वनीय किये जाते है की जनता को अच्छे दिन की चाह दिखने लग जाती हैं और नेता अपने मकसद को हासिल कर सत्ता में आ जाते हैं, कुछ फीसदी नोजवानो को रोजगार व् नोकरिया दे कर खुद की गरीबी दूर करने में लग जाते हैं, जो नई योजनाओ का शरुआत भ्रस्टाचार के भेंट चढने के लिए की जाती हैं, इन योजनाओ का लाभ सिर्फ उधोगपतियों के लिए ही बनाया जाता हैं, जिससे देश की 25% जनता ही टेक्स दे पाती है जिसके कारण देश में गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षिता, अस्वस्थता, आदि हैं, सवाल इस बात पर उठता हैं की नेता सिर्फ झूटे वादों के लिए ही होते हैं, या इन वादों पर भी कानून बनना चाहिए जो जनता को भ्रमित कर अपने फायदे के लिए किये जाते हैं, और चुनाव बाद जनता उन तमाम वादों को भूल जाती हैं जो उनसे नेताओ ने किये थे, और नेता सत्ता हासिल कर हारफूल-माला पहन कर अपनी विधानसभा में जा बैठते हैं, और अपनी जिन्दगी एंसोआराम से जीते हैं और पार्टी के कार्यकर्ताओं को 20% कमिशन पर अपने क्षेत्र में छोड़ देते हैं, अगर उन पांच सालो में जो नेता ज्यादा बदनाम होता है तो वह पार्टी बदल लेता हैं, और उन नेताओ की ‘’मन की बात’’ सिर्फ एक ही होती हैं “ भाड़ में जाये जनता, अपना काम तो बनता “ ! देश की पार्टिया अपनी समस्या का हल तो इस तरह निकाल लेती है, और जनता को हर बार यु ही रोना पड़ता हैं, एक बार फिर से जीत का जश्न और ढोल नगाड़े पूरी जनता को बेवकूफ बनाने की ख़ुशी में बजाये जाते हैं, इन्ही नेताओं से पूरा देश परेशान हैं कैसे कहू की ‘’मेरा देश महान हैं’’ और यह दौर यु ही चलता जा रहा हैं , और देश हर बार ठगा जा रहा हैं ,
                हम सब मिल कर करे तेयारी, दुबारा सत्ता में ना आये यह पुजारी,,

              जन जन की हो एक ही आवाज, मिटा दे इन नेताओं के रीति रिवाज,,



                                                ''माँ भारती हम सब को पुकारती, “नोटा” से इनकी अब करो आरती,,

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