मोदी की भी चाहत थी, मतदाताओं को मिले ‘राइट टू रिजेक्ट’ का पावर

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिए अहम फैसले में मतदाता को राइट टू रिजेक्ट का अधिकार देने पर अपनी मुहर लगा ही दी। इसपर तमाम प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं, लेकिन हम आपको बता दें कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पहले से ही इसके समर्थन में थे। 29 जून, शनिवार को गांधीनगर में यंग इंडिया कॉनक्लेव में बोलते हुए मोदी ने कहा था कि मतदाताओं को नेताओं को खारिज करने के लिए राइट टू रिजेक्ट का अधिकार मतपत्र में मिलना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि इस अधिकार के मिलने के बाद गंदी हो चुकी राजनीति में सुधार संभव है। महात्मा गांधी मंदिर में मोदी को सुनने के लिए दो सौ लोगों का डेलिगेशन मौजूद थे। यह सभी देश के विभिन्न शहरों से यहां पर आए थे। अपने भाषण में मोदी ने कहा कि एक बार मतदाताओं को राइट टू रिजेक्ट का अधिकार मिल जाएगा तो राजनीतिक पार्टियां पर साफ सुथरी छवि के लोगों को टिकट देने का दबाव बन जाएगा। वह यहां पर बिजनेस और और सरकार किस तरह से युवाओं को नई राह दिखा सकती है विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा एक तय सीमा रेखा के अंदर उन नेताओं को जिन्हें तय सीमा रेखा के अंदर राइट टू रिजेक्ट मिला हो, चुनाव में जीतने के बाद भी हारा हुआ माना जाना चाहिए। मोदी को यहां सुनने वालों में बैंक, कंसलटेंसी और शिक्षा के क्षेत्र के लोग शुमार थे। चुनाव सुधार पर बोलते हुए मोदी ने कहा कि वह चाहते हैं कि गुजरात में सभी के लिए लोकल बॉडी के चुनाव में मतदान करने को जरूरी नियम बना दिया जाए। गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी चुनाव में मतदाता को राइट टू रिजेक्ट का अधिकार दिलाने के पक्षधर हैं। इसके अलावा समाजसेवी अन्ना हजारे भी इस अधिकार के पक्ष में लंबे समय आंदोलन चलाए हुए हैं।

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