छोटे-बड़े कई दलों से ज्यादा ‘नोटा ‘ में पड़े वोट

हनुमान गालवा/जयपुर। राजस्थान में वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में ईवीएम में नोटा (नन ऑफ अबव) का पहली बार विकल्प दिया गया। पहली बार में ही ‘नोटा ‘ में प्रदेश के कुल वैध मतों में 1.93 प्रतितश मत पड़े, जो कई छोटे-बड़े दलों के प्रत्याशियों में प्रदेश में मिल कुल मत प्रतिशत से ज्यादा रहा।
प्रदेश में वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कुल वैध मत चार करोड़ आठ लाख 29 हजार 312 पड़े थे। प्रदेश के इन कुल मतों से नोटा के खाते में पांच लाख 89 हजार 923 वोट पड़े। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में मतदान 75.04 प्रतिशत रहा। भाजपा, कांग्रेस तथा बसपा के अलावा शेष सभी छोटे-बड़े दलों के प्रत्याशियों को प्रदेश में नोटा से ज्यादा प्रतिशत वोट नहीं मिले। भाजपा को 45.17, कांग्रेस को 33.07 तथा बसपा को 3.37 प्रतिशत मत मिले। शेष सपा, सीपीएम, सीपीआई, राकांपा, जदयू, जद सेकुलर तथा अन्य दलों के प्रत्याशियों को नोटा से कम वोट मिले।

नापसंदगी का इजहार
प्रत्याशी की हार या जीत में नोटा में दिए गए वोट हालांकि कोई मायने नहीं रखते हैं, लेकिन सभी प्रत्याशियों के प्रति नापसंदगी की अभिव्यक्ति के इजहार का यह सशक्त संदेश माना जाता है। मतदान में प्रकट होने वाली नाराजगी राजनीतिक दलों की नीति-रीति तथा प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया को सीधेतौर पर प्रभावित करती है। सोशल मीडिया पर प्रचार
राजस्थान में इस बार विधानसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल बढऩे के कयास लगाए जा रहे हैं। नोटा को लेकर सोशल मीडिया पर अभी से मुहिम परवान पर है। सत्तारूढ़ भाजपा सरकार से नाराज युवा तथा कर्मचारी वर्ग भी नोटा में वोट डालने की मुहिम को बढ़ावा देते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रचार किया जा रहा है कि चुनाव में किसी को मत दें या नहीं, लेकिन घर नहीं बैठे रहें। ———-
‘नोटा ‘ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के परिष्करण की दिशा में बड़ा सुधारवादी कदम है। इससे मताधिकार मजबूत होगा। अब किसी मतदाता के सामने उपलब्ध प्रत्याशियों में से किसी एक को चुनने की बाध्यता नहीं रहेगी। नोटा के रूप में मतदाता की राय राजनीतिक दलों की प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करेगी।
– डॉ. ओम महला, प्राध्यापक, राजस्थान विश्वविद्यालय

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