कौन सुनेगा किसको सुनाये ?

हमारे देश की जनता का दुर्भाग्य हैं की स्वतंत्र देश का नागरिक होने के बावजूद भी जाति, धर्म, के नाम से हर भारतवासी जकड़ा हुआ हैं, देश की आजादी के समय हर नागरिक का एक ही मकसद था, अंग्रजो से आजादी और इस आजादी में हर भारतवासी एक था, लेकिन आजादी के बाद कुछ लोगों ने अपनी सियासती ताकत आजमाना शुरू कर दिया ! और देश को जाति, धर्म से तोड़ने का काम किया, जिसके परिणाम स्वरूप आज भारत कई टुकडो में बंटा हुआ हैं, और यह दौर निरंतर जारी है, जिसके कारण देश को अन्दर से कमजोर करने के साथ देश की अर्थव्यवस्था का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा हैं , और विदेशी ताकते देश पर पूरी तरह से हावी हो रही हैं, जिससे देश का नागरिक बेरोजगारी, भूखमरी की कगार पर हैं, देश की आजादी के 71 साल बाद भी देश के हालात जेसे के तेसे हैं , 71 साल बाद भी देश की कानून व्यवस्था का कोई फर्क देखने को नही मिलता हैं , भारत कृषि प्रधान देश होने के बाद भी देश का किसान आत्महत्या कर रहा हैं और हर साल यह आकड़ा बढ़ता जा रहा हैं, आखिर सवाल इस बात को सोचने पर मजबूर करता हैं की देश का किसान खेत में दम तोड़ता हैं और देश का जवान देश की रक्षा के लिए दम तोड़ता हैं , लेकिन सरकारों ने इन दोनों के लिए आज तक क्या किया ? यह केसी व्यवस्था हैं मेरे देश की ! आखिर क्यों नही बनता इनके लिए भी कोई कानून ! लेकिन देश की पार्टियों का इन पर सियासत करने का मोका बिलकुल नही चुकती और देश की जनता को बेवकूफ बनाने का काम हर बार करती रहती हैं , और बेरोजगारों को धर्म व् जाति के नाम से दंगे करवाने का काम करते हैं जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था में काफी नुकसान होता हैं , और लोकतंत्र की पार्टिया एक-दुसरे को नीचा दिखाने में कामयाब हो जाती हैं, उन पार्टियों के नेताओ का काम सिर्फ घोटालों की बाढ़ का काम करने के समान होता हैं, जिससे देश की सरकार का ध्यान देश की जनता पर नही जाता और देश का नागरिक अपने भाग्य को कोसता हैं और देश की अर्थव्यवस्था भगवान भरोसे पर चलती हैं ! आओ चुने एक अच्छा विकल्प, सब मिलकर करे संकल्प आखिर ऐसा क्यों हर बार होता हैं , अब तो चुनाव निशान “नोटा” हैं,,

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