कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस ने नहीं, इसने रोका बीजेपी का विजय रथ

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी का विजय रथ 104 पर रुक गया है. बीजेपी कर्नाटक में बहुमत पाने से सिर्फ 8 सीट पीछे रह गई है. लेकिन ऐसा नहीं है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जेडीएस की रणनीति ने बीजेपी के चुनावी रथ को रोक दिया है. बीजेपी को जीत से रोकने वालीं ये पार्टियां नहीं बल्कि वोटर को नाराजगी जाहिर करने के लिए मिला अधिकार नोटा (उपरोक्त उम्मीदवारों में से कोई नहीं) है. जी हां, आप बिल्कुल ठीक समझे. बीजेपी की हार वाली 5 सीट तो ऐसी हैं जहां नोटा को हार के अंतर से अधिक वोट मिले हैं. वहीं तीन सीट ऐसी भी हैं जहां नोटा में गए वोट की संख्या बीजेपी की हार के अंतर में मामूली सा ही अंतर है. इन सभी 8 सीट पर नोटा में गए वोट की संख्या अगर जरा भी बीजेपी के पक्ष में हो जाती तो आज कर्नाटक का नजारा ही दूसरा होता. अगर कर्नाटक चुनाव में नोटा को मिले वोटों की बात करें तो 3.22 लाख हैं. कुल मतदान का 0.9 प्रतिशत वोट नोटा को गया है. इस लिहाज से नोटा कर्नाटक में चौथी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आया है. क्योंकि बीएसपी, आम आदमी पार्टी और सीपीएम सहित कई दूसरी पार्टियों को 0.2 से 0.3 प्रतिशत ही वोट मिले हैं. साल 2013 में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद नोटा का बटन ईवीएम पर आखिरी विकल्प के रूप में जोड़ा गया था. इस लिहाज से कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है. नोटा का मतलब यह है कि मतदाता किसी भी उम्मीदवार को योग्य नहीं पाने की स्थिति में नोटा का बटन दबा सकता है. हालांकि नोटा को मिले वोट की संख्या सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों की संख्या से अधिक हो तब भी उस उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाएगा जिसे चुनाव मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले हैं. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राजनीतक विज्ञान विभाग में प्रोफेसर अब्दुल रहमान का कहना है कि ” नोटा में तीन तरह के लोग वोट डालते हैं. पहले वो लोग जिन्हें बीजेपी से नाराजगी थी, लेकिन वो कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहते थे. दूसरे वे जिन्हें बीजेपी, कांग्रेस दोनों से नाराजगी है और तीसरे वे जो सभी दलों से नाराज हैं.

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